Skip to main content

Posts

कुछ चीजे अनकही सी ही अच्छी लगती है, कुछ अनसुलझी सी अच्छी लगती है | कोशिशे तमाम कर लो उन्हें समझाने और सुलझाने की, लेकिन न चाहते हुए भी कुछ उलझी सी ही अच्छी लगती है | ख्वाब तो हजारों सजा लिए हमने तुम्हे देखते हुए, लेकिनअब नजरों से दूर, इन अहसासों में तुम्हारी मौजूदगी भी अच्छी लगती है | कुछ रिश्तें बेनाम होते है यूँ तो लोगो के लिए आम,  पर खुद के लिए बेहद खास होते है छोटी छोटी बाते, कुछ पल की मुलाकातें लोगों से नही खुद से करते थे हम जिक्र हमारा किसी रोज़ तुम जब रूठती थी, फिर कुछ पल खुद से लड़ती थी, जताता नही था, पर मैं भी करता था फ़िक्र तुम्हारा छोटे छोटे लम्हों को समेटे एक दौर सा बीत गया तुम पास रहे या दूर उन छोटी छोटी बातों से एक एहसास जुड़ता गया एक एहसास, जो इस जहां से परे हमारी हुई उन बातों में ख्वाबों सा जगह कर गया तेरे रूठने से मेरे मनाने तक का वह दौर हर पल तमाम कहानियां गढ़ता गया जिसमें हम कभी लड़े, शिकवा और शिकायतें भी रही बस कम न हुई तो नजदीकियां तुम किसी ढ़लती शाम सी बिखरती जरूर थी पर अगली सुबह मिलने की आस भी रही हर रोज़ तुम्हारा आना जाना लगा रहा तेरी याद...
उनकी अदाओं ने मचा रखी थी कुछ अलग सी तबाही सबको लगा माह है सावन का, दिख रही हरियाली मैंने लिखा था अपने एहसास और जज़्बातों को खुद कलम बन, जिसकी थी वो सफ़ेद स्याही शायद कभी वो देख न सकी, उन्होंने आज उभरे पन्नो को पढ़ बोला तुम क्या खूब लिखते हो तबाही #बनारस_दिल्ली_इश्क़
वो झुकी नजरें कुछ बिखरी सी जुल्फें बदल गयी उस एक नजऱ को जो उसे कब से निहारे जा रही थी वो कुछ छोटी छोटी बातों में उलझी थी ये दिल कुछ पल भर की मुलाक़ात की उम्मीद किए एक बड़ी गुप्तगू फ़िराक में था नजऱ से नजऱ मिलती रही वो इस नजऱ को देख खुद की पलकों में छिपती रही वो कुछ क़दम दूर खड़े नज़रो के सहारे ही सही हौले हौले दिल के करीब आते गए #टुरी_पर_नज़र 😉

पुलवामा

तुम करो तमाशा, मैं देख रहा हर नारेबाज़ी समझ रहा तुम खुली आसमां में चिल्ला रहे हो मैं इस बन्द तख़्त में सिमट रहा बैनर, पोस्टर और मोमबत्तियों से मुझकों तुम भुना रहे, सोशल मीडिया और गालियों से क्रांति तुम फैला रहे अरे ठहर ज़रा, बस शांत बैठ तू एक क़दम बढ़ा तू उस घर पे जहाँ एक बूढ़ा बैठा ठिठक रहा बेटा माँ से लिपट रहा उस बूढ़ी माँ के आँसू पोछो कुछ करना है तो उसे गले लगा मुझ जैसे और लाखों थे जो भारत माँ की बलि चढ़े क्या बदलेगा तू इन सब से धर्म, जाति या अपना खुदा कुछ तो अपनी अक़्ल लगा तू देख अब भी मेरी चिता पर कोई अपनी रोटी सेक रहा ।। #पुलवामा_शहीद   #नमन Arun kr jaiswal

इश्क़ ए लफ्फाज़ी (भाग 6)

यूं तो सफ़र एक शहर से दूसरे शहर चलता रहा, मौसम बदलता रहा, बदलते मौसम के साथ नए लोग मिलते गए , लोगो के साथ मिज़ाज़ बदलता गया, इस बदले मिज़ाज़ में अल्फ़ाज़ भी जुड़ते गए। अल्फ़ाज़ यूं ही नही जुड़े, इन एहसासों की एक लंबी कतार थी, वही कतार जिनमें उनकी चाहत पर फिसलने वालो की कमी न थी, और हम उनमें कहीं खड़े होने भर की जगह तलाश रहे थे । जगह बनाने की जद्दोजहद में समय बीतता गया, अपने अल्फ़ाज़ के साथ साथ एहसास भी गहराते गए और वो हौले हौले ही सही पर कुछ करीब आने लगे । हवा के झोंके सा कुछ ही पल में उनका बुखार सर चढ़ गया, और प्रेम की बारिश लिए मौसम बदला और ठंड में उनके एहसासों की गर्माहट लिए सफर माह ए मोहब्बत क पहुँच चुका था। यह मोहब्बत का महीना यूं तो सबके लिए बेहद ख़ास रहा, सबको अपनी अपनी मोहब्बत जताने की जैसे रेस लगी थी, वैसे देखा जाय तो मोहब्बत के लिए किसी खास दिन, समय या महीने का होना बिल्कुल आवश्यक नही लेकिन जो नए नए मोहब्बत का बुखार जो होता, कहाँ अब इस वैलेंटाइन वीक के गोली के बिना सही होने वाली होती । अब इस वैलेंटाइन वीक के भी कुछ छः सात वार थे, जिनमे टेडी डे, चॉकलेट डे, रोज़ डे सहित प्रोपोज़ल डे भी खास थे ...
दिल्ली से किसी रोज़ गुज़रा एहसासों के एक दौर से निकला उन एहसासों को शब्दों में पिरोना क्या शुरू किया ये दिल भी उनका दीवाना हो उठा सफ़र शहर दर शहर बढ़ता गया इन शब्दों के माया जाल में लोग भी उलझते गए दरकार तो इस बात की रही इन शब्दो की दिल्लगी पर दिल तो सभी को आया पर इनके दरवाजों से झाक छिपे दिलबर तक न पहुँच पाए फिर याद आया शहर दिल तो वही, पर दिल्लगी न हुई 
ख़ामोश हूँ इस चहल पहल में बसा कुछ यादों के भीड़ में खड़ा बस खामोश हूँ। देख रहा हूँ तुम्हारे चेहरे के बदलते इन रंगों को पढ़ रहा हूँ जीवन के बदलते हर ढंग को कैसे तुम कुछ लम्हों में आकर सदियों सी छाप छोड़ गए दरअसल खुद की परछाई में अब भी तुमको समझ रहा हूँ ।। शायद समझ चुका हूँ या समझने की कोशिश कर रहा हूँ पर तुम निकल चुके हो बदल चुके हो मैं अब भी आसमां सी खुली इस जीवन मे गुज़रे लम्हों की कहानियों को सुन रहा हूँ पर खामोश हूँ । ख़ामोश हूँ क्योंकि इस बदलतें वक़्त के साथ तुम्हें बदला हुआ देखकर अब भी मैं, खुद को नही बदलना चाहता क्योकिं अब भी मैं वही हूँ बस ख़ामोश हूँ ।।

एक लड़का

लिखना है कुछ तो लिखो हर बात बोल कर बताई नही जाती छवि तुम्हारी कुछ यूं बिखरी है इन समझदारों के समंदर में कि तुम आह भी भरो तो लोग समझेंगे जरूर कोई दर्द या तन्हाई है करो कोशिश तुम उन्हें जानने की पल भर के लिए भी उन्हें पहचानने की तुम पकड़े जाते हो किसी के जहनों जहां में एक शिकारी की तरह, एक बलात्कारी की तरह ये छवि है एक जमात की जिसकी तुम पैदाईस हो बचो तुम, समझो तुम लिखो अपनी कहानी को कुछ इस तरह कि जब तुम बात करो अपने मन की इज़हार भी करो अपने दिल की... हर लड़की समझे तुम्हारी जुबानी को न मजबूर हो खुद को समझाने को #एक_लड़का

उस चेहरे की सिकन को देखो ...

उस चेहरे की सिकन को देखो जब वह कुछ अनजानों के भीड़ के बीच छिपा हो देखो उसके अंदर की बेचैनी को जब वह कुछ कदम दूर रखें हुए भी टकटकी लगाए निहार रहा एक कोने को कुछ खटपट सी क्या हुई आँखों के साथ साथ सहारा लिए हाथ भी बेसहारा हो बढ़ाते है अपने कदम अपने जिगर को बचाने किसी गैर नजर से देखो गौर से उस चेहरे को इस दौड़ती ट्रेन, भरी भीड़ में लोगो के भागती नजरों के बीच एक पिता खड़ा है, अपनी बेटी से कुछ ही कदम दूर शायद इस सफर को मजबूर .... #सफ़र_में

तुम अकेले हो

एक भीड़ है जिसमें हर पल तुम अकेले हो जब जब सोचो तुम अपने मन की सब पृथक पृथक सा लगता है जब घुल मिल जाओ उस भरी भीड़ में सब बिखरा बिखरा लगता है हर किसी की जब नज़र पड़े तुमपर हर एक निगाह में तुम बहुतेरे हो पर जब कोई खुद से ढूंढे खुद को हर भीड़ में बस तुम अकेले हो भीड़ बढ़ी है पर नजर झुकी है तुम अपनी नजर उठा कर देखो अलग अलग चेहरों में लिपटी यह बेगानों की बस्ती है तुम उस चलती फिरती भीड़ में हो शायद इसलिए तुम अकेले हो टूट पड़ो तुम बिखर पड़ो उस भरी भीड़ से इतर चलो कण कण से राह बनाने को तय करो तुम खुद की मंजिल जब कभी तुम अकेले हो जब मंजिल होगी रास्ता होगा फर्क क्या पड़ता कि तुम अकेले हो कुछ ऐसा कर गुजरो सपना सबका हो, मंजिल अपना हो और उसे पाने वाले उस भीड़ में तुम अकेले हो ।